ANGREZI MEDIUM
निर्देशक: होमी अदजानिया
कास्ट: इरफ़ान खान, दीपक डोबरियाल, करीना कपूर, डिंपल कपाड़िया, राधिका मदान, पंकज त्रिपाठी
समीक्षा: हरपाल सिंह
फिल्म देखने जाने से पहले ध्यान रखें कि इस फिल्म का ' हिंदी मीडियम ’नाम की फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है… दोनों फिल्मों की कहानी का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है… और दोनों फिल्मों के निर्देशक भी अलग हैं
फिल्म की कहानी के बारे में ज्यादा कुछ कहे बिना मैं सिर्फ इतना लिखूंगा कि यह कहानी एक पिता और बेटी के बीच एक भावनात्मक रिश्ते की कहानी है ... जिसमें बेटी को इंग्लैंड जाने का शौक है ... और उसके पिता उसकी इच्छा पूरी करने के लिए पूरी कोशिश करता है…
फिल्म का इंटरवल से पहले वाला हिस्सा ताजा है ... जिसमें कई दृश्य दिल जीत लेते हैं ... चाहे पिता और बेटी के भावनात्मक दृश्य हों .... या शराब पीने वाले दो भाइयों के दृश्य हों .... या भाइयों की आपसी लड़ाई को अदालत में ले जाना हो .... सभी दृश्यों को मज़ेदार बनाया गया है .... इसमें हास्य भी है ... कॉमेडी में हास्य पैदा करते पंच हैं और खास बात रिश्तों की भावनाएं गायब नहीं होती हैं ... पर इंटरवल से ठीक पहले वाला दृश्य बहुत बुरी तरह से बनाया गया है .... यह ऊपर की ओर चलती हुई फिल्म को नीचे फेंकता है ...
इंटरवल के बाद, फिल्म एक बार फिर से अपनी लय में लौटने की कोशिश करती है ..... लेकिन यह हवाई जहाज की तरह गति नहीं पकड़ती है बल्कि पसेंजर गाड़ी की तरह हो जाती है ..... लेकिन इरफान खान की वजह से यह देखने लायक बनी रहती है....
बहुत सारे दृश्य देखने के बाद मुझे पंजाबी फिल्म ' चल मेरी पुत्त ’के पहले भाग की याद आती है...… .जिसमें पंजाबी लड़के इंग्लैंड जाते हैं और रहने के लिए कोई ठिकाना ढूंढने की कोशिशें हंसी पैदा करती हैं और यकीनन ऐसी एक जैसी सिचुएशन में पंजाबी फिल्म वाले बेहतर हास्य पेश करते हैं....
यह कहने की जरूरत नहीं है कि इरफान खान की भूमिका कैसे होगी .... वह बहुत स्वाभाविक हैं ... उनकी शैली कुछ इस तरह की है कि वे एक ही दृश्य में एक ही इशारे से कई लोगों को हंसा रहे हैं होता है ... और बहुतों की आंखों में आंसू झलक रहे होते हैं .... फिल्म कारवां के बाद उनकी वापसी का इंतजार था...जो बेशक उनके अभिनय में कद के हिसाब से नही है....लेकिन उनको सिनेमा के पर्दे पर देख भर लेने से ही आँखों को सकून मिलता है....
इरफ़ान ख़ान और उनके चचेरे भाई की भूमिका में नज़र आने वाले दीपक डोबरियाल ने दोनों ने फ़िल्म को बेहतर करने के लिए अपनी पूरी कोशिश की है ... दोनों शराबी दृश्यों में बहुत अच्छे लग रहे थे .... लेकिन हवाई अड्डे और विदेश में आने से बाद के कुछ दृश्यों में वे ऊब पैदा करते हैं......... लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि यह दोनों को देखने में मज़ा नहीं है ...पर जो उम्मीद थी वो धराशाही होती है....
इरफान की बेटी की भूमिका में राधिका मदान ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है ... जहाँ वह भावनाओं को दिखाने वाली थी ... वहाँ उसने भावनाएँ दिखाईं ... जहाँ वह शैतान बनने वाली थी ... वहाँ वह एक शैतान बच्ची दिखी ...वह अपने किरदार के हर रंग में बहुत प्यारी लग रही थी .... इरफान के साथ सभी दृश्यों में उसने इरफान की तरह अपनी भूमिका निभाई है .. और कहीं भी इरफान के सामने दब गई नही लगी....
कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितनी बार हम सभी ने कीकू शारदा को टीवी पर कॉमेडी करते देखा है .... लेकिन फिर भी उनकी भूमिका ताज़ा है ...वह यहां टीवी स्क्रीन वाले अपने रंग से अलग ही नज़र आते हैं....वह सच में अपनी भूमिका में कामयाब रहे हैं....
पंकज त्रिपाठी का एकमात्र दृश्य है ... लेकिन यह एक मजेदार दृश्य है .... वह अपने एकमात्र दृश्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में ज़रा नही चूके....
करीना कपूर का रोल ज्यादा नहीं ... जितना है ठीक ठाक है....
डिंपल कपाड़िया का चेहरा आज भी आकर्षक है ... और उन्होंने अपने कुछ दृश्यों में भी अपना काम कर दिया है
रणवीर शौरी की भूमिका बहुत लंबी नहीं है .... लेकिन उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है...बहुत सी घटनाएं उनके साथ जुड़ी रहती हैं...इसलिए वह छोटी भूमिका में भी ज्यादा तवज्जो हासिल करते हैं....
पिछली फिल्म हिंदी मीडियम जहां भाषा के महत्ब को लेकर बनी थी ... यह वाली फिल्म दो तरह की संस्कृतियों को ध्यान में रखकर बनाई गई है ....हमारे समाज और विदेशी लोगों के पारिवारिक रिश्तों में जो फर्क है वो दिखाया गया है ... फिल्म शुरुआती दृश्यों में बहुत स्वाभाविक लगती है ... लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है और अलग अलग किरदार सामने आते हैं .... फिल्म थोड़ी फिल्मी हो जाती है .... और जहां पर यह खत्म होती है उसके अंत का अंदाज़ा जरूर ही बहुतेरे दर्शकों को पहले से ही हो गया होगा...
कई सीन आंखों में आंसू ला देते हैं .... जिसमें इरफान की स्वभाविक एक्टिंग का दम नज़र आता है.... और इससे पता चलता है कि क्यों उनके फैंस उनकी फिल्मों में वापसी का इंतजार कर रहे थे ...
फिल्म में कैमरे का काम कितना महत्वपूर्ण है, यह एक ऐसे दृश्य में देखा जा सकता है जिसमें इरफान अपनी बेटी के साथ अपनी मां के बारे में बात कर रहे हैं .... इस दृश्य के दौरान, इरफान कैमरे में हैं ... उनकी बेटी ... और फिर दीवार पर लड़की की माँ भी तस्वीर में दिखाई दे रही है .... यहाँ कैमरा पिता और बेटी से परे नहीं जाता है ... और न ही धुंधला होता है ... फिर भी माँ की तस्वीर दर्शकों की नज़र में आती है..और यह दृश्य जिस तरह से निर्देशक दिखाना चाहते थे कैमरामैन ने कामयाबी से दिखाया है....
संगीत बस ठीक ही है ...
जब गीत "एक जिंदगी मेरी" शुरू होता है ... यह बहुत मधुर लगता है ... लेकिन जैसे ही उसमें तेज उपकरणों का उपयोग होना शुरू होता है ... शब्द वाद्य की तेज आवाज में दब जाते हैं और गाने से सिर दर्द होने लगता है ...
"ओरी ओ चिरैया" गीत बहुत प्यारा और भावुक है .... जिस स्थिति में यह आता है ... निश्चित रूप से सभी की आंखों में आंसू लाएगा .... यदि आप एक बेटी के पिता हैं तो यह गीत आपको और ज्यादा भावुक कर देगा ...
फिल्म के संवाद भी खूबसूरत हैं .... इन सभी का उल्लेख करना मुश्किल है .... लेकिन एक संवाद मुझे बहुत पसंद आया -
"एक बच्चे के रूप में, एक बच्चा हमारी उंगली पकड़ लेता है और दूर चला जाता है ... ताकि भीड़ में खो न जाए ... फिर एक दिन जब वह हमारी उंगली छोड़ देता है ... ऐसा लगता है जैसे हम हार गए हैं ..."
फिल्म परिवार के साथ देखने लायक है....... ऐसा कोई दृश्य नहीं है जो परिवार में बैठकर बुरा लग सकता है ...
अगर आप एक बेटी हैं और विदेश जाने के लिए पागल हो रही हैं ... तो आपको यह फिल्म एक बार अवश्य देखनी चाहिए .... और यदि आप एक बेटी के पिता हैं ... तो आपको भी यह फिल्म देखनी चाहिए .... एक पिता का अपनी बेटी के साथ कैसा रिश्ता होना चाहिए इसके लिए इरफान का किरदार जरूर देखने वाला है....जो यह बताता है कि अगर भावनाएं बहुत ज्यादा हों तो बेटी बाप का कहा बिना उसके डांटे भी समझ सकती है...
यह फ़िल्म इरफान की सिनेमा के पर्दे पर वापसी का जश्न मनाने के लिए देखी जा सकती है...
रेटिंग - 3/5
harpal1980.singh@gmail.com

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